Saturday, 15 September 2018
सुन्दरता..
Friday, 14 September 2018
बिरला_बीएचयू_और_बवाल
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यह तीन शब्द काशी हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़े हर व्यक्ति ने सुने होंगे। और इन तीनों के आपसी संबंध को भी समझता होगा। लेकिन इन तीन शब्दों का वास्तव में कोई संबंध है या ये एक बनी बनाई अवधारणा के पोषक हैं। विरोध, मुखरता, यदि सभ्य समाज के तत्त्व नहीं है तब यह माना जा सकता है कि कला को पढ़ने और समझने वाले छात्रों में यह पाया जाता है। और इस तरह छठ असभ्य हैं। तमाम विषमताओं का बोझा ढोता कला संकाय यदि इनका विरोध कर असभ्य कहलाता है। तो कहलाता रहे। यदि किसी भी अराजक घटना या अराजक स्थिति के लिए छात्र जिम्मेदार हैं तो तुमसे ज्यादा प्रशासन और वे परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। जिनके कारण अराजकता उत्पन्न होने दी जाती है। माहौल को बिगड़ते हुए, पहले तो प्रशासन दर्शक बनकर तमाशा देखता है और फिर दोहरेपन की कार्यवाहियां कर अपने को जिम्मेदारियों से बचाता है। दही छात्रों की बात ,तो बात का बवाल कोई भी छात्र नहीं बनाता। बल्कि उन छात्रों की आड़ में तथाकथित छात्रनेता ,जो छात्र तो किसी भी हाल में नहीं होते ।वे अपने रौब और राजनीति चमकाते हैं । और ऐसे छात्र सिर्फ बिरला में पाए जाते है ये सोचना मूर्खता है क्यूंकि ऐसे प्राणी हर फैकल्टी और हॉस्टल में पाए जाते है । और ये हर छोटी बात का बतंगड़ बनाने , उसको आत्मसम्मान का मुद्दा बनाने , और फिर इस आग में अपनी स्वार्थ की रोटियां सेंकने से नहीं चूकते । इसीलिए सभी समझदार छात्रों से यही अपील है कि खुद का दुरुपयोग होने से स्वयं को बचाएं । और प्रशासन से कहना है , कि कार्यवाही करने का शौक यदि इतना ही है तो घटना से पहले कार्यवाही करें ...असली जिम्मेदारों पर कार्यवाही करें...किसी पर भी कार्यवाही कर खानापूर्ति न करें । उनकी समस्याओं पर ध्यान दें । एक अच्छे माहौल की चाहत हर विद्यार्थी का सपना होती है । उसको उपलब्ध कराएं ।
जय महामना !!
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#daily_dairy_03
#date_14_09_2018
Tuesday, 11 September 2018
खुश होना आसान है !
खुश होने की वजहें , यदि हम खोजें तो कहीं मिल सकती है। बस आपके पास नजर होनी चाहिए। जिससे आप अपने आसपास व्याप्त खुशियों को अपने अंदर समाहित कर सकें इंसान दूसरों की खुशियों में खुश होना सीख ले तो संसार का कोई भी गम उसे दुखी नहीं कर सकता यह एक सार्वभौमिक सत्य है । दरअसल , खुश होना इतना भी कठिन नहीं है । जितना हमारी आधुनिकता भरी जिंदगी ने उसको कठिन और जटिल बना दिया है। हम मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड में इतना खो चुके हैं कि हमें ना खुद का ख्याल है ना ही खुद के अंदर व्याप्त संवेदनाओं, भावनाओं और भावों को संजोने की फुर्सत है। हम बस भागे जा रहे हैं। ऐसी दौड़ में जिसका ना कोई अंत है ,ना कोई मंजिल और इस अंधी दौड़ में हम खुशियों की बात कहां से करें ? यही कारण है कि वर्तमान में समृद्धि , प्रसिद्धि ,सफलता पा पाने के बावजूद भी इंसान खुद को अकेला महसूस करता है। यही उसका अकेलापन उसके लिए कई बार घातक सिद्ध होता है। हम शिक्षा प्राप्त करते हैं और एक ही दौड़ में भाग जाते हैं। वह है- पैसे की दौड़ , सफलता की दौड़ ,जॉब की दौड़ ,करियर की दौड़ और ना जाने कितनी आशाओं की दौड़ ; जो एक बार पूरी होती हैं तो दूसरी नई पनप जाती है। इस तरह न ये दौड़ खत्म होती है और न हमारा भागना रुकता है। भागने में हम खुश होना भूल जाते हैं। जिंदगी को जिंदादिली के साथ जीना भूल जाते हैं । हर पल को यदि हम जी नहीं सकते तो दुनिया की कोई भी शक्ति हमको खुश नहीं कर सकती और इस तरह हम परम दुखी रहेंगे । इसीलिए आपसे बस इतना कहना है कि पलों को जीना सीखें । बेफिक्र होना सीखें। अल्हड़ होना सीखें । शरारतें करना सीखें । हंसना सीखें। ठहाके लगाना सीखें। मुस्कुराना सीखें। जब आप यह सब सीख जाएंगे तो आपको खुश होने से कोई नहीं रोक सकता।
इसीलिए मुस्कुराइए! खुश रहिए !! जिंदादिल रहिए !!!
धन्यवाद !!
#thoughtful_anil©
#daily_dairy_02
#be_happy
नास्तिक-आस्तिक !
#हां_कंश_मैं...
#हां_कंश_मैं.. मैं तुच्छ मैं स्वार्थी मैं घृणापात्र मरघट की राख़ मैं नफ़रत की आंख मैं चोर मैं पापी अघोर मैं लोभी मैं कामी मैं चरित्...
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लोगों ने कहा तू रो रो कर क्यूँ रात गुजारा करता है क्यूँ शाकी से मुँह धो धो कर जीने का सहारा करता है माना कि ''बेगाना...
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ताउम्र उसके आने का इंतज़ार रहा || न चाहती थी वो हमें फ़िर भी प्यार रहा || जन्नत में मिलेगी तो पूछूँगा क्या बेगाना था , अनिल जो उम्...